इस ब्लॉग पर सभी हिंदी विषय अध्ययनार्थी एवं हिंदी विषय अध्यापकों का हार्दिक स्वागत!!! मच्छिंद्र भिसे (हिंदी विषय शिक्षक, कवि, संपादक)

Friday, 8 September 2017

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस ८ सितंबर

अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस (अंग्रेज़ी: International Literacy Day) विश्व में 8 सितंबर
को मनाया जाता है। वर्तमान युग में शिक्षा बहुत ज़रूरी है। शिक्षा के बिना किसी कार्यक्रम का नियोजन सम्भव नहीं है। शिक्षा हमारे जीवन का आवश्यक अंग है। सरकार सर्वशिक्षा अभियान चलाकर प्रत्येक व्यक्ति को साक्षर बनाने के लिए विभिन्न योजनायें संचालित कर रही है। एक व्यक्ति का शिक्षित होना उसके स्वयं का विकास है, वहीं एक बालिका शिक्षित होकर पूरे घर को संवार सकती है। जब देश का हर नागरिक साक्षर होगा तभी देश की तरक़्क़ी हो सकेगी। 

तात्पर्य
साक्षरता का तात्पर्य सिर्फ़ पढ़ना-लिखना ही नहीं बल्कि यह सम्मान, अवसर और विकास से जुड़ा विषय है। दुनिया में शिक्षा और ज्ञान बेहतर जीवन जीने के लिए ज़रूरी माध्यम है। आज अनपढ़ता देश की तरक़्क़ी में बहुत बड़ी बाधा है। जिसके अभिशाप से ग़रीब और ग़रीब होता जा रहा है।


उद्देश्य
साक्षरता दिवस का प्रमुख उद्देश्य नव साक्षरों को उत्साहित करना है। अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस हमारे लिये अहम दिवस है, क्योंकि हमारे जीवन में शिक्षा का बहुत अधिक महत्त्व है। हमारे देश में पुरुषों की अपेक्षा महिला साक्षरता कम है। हमें आज के दिन यह संकल्प लेना होगा कि हर व्यक्ति साक्षर बनें, निरक्षर कोई न रहे। हमें अपने यहाँ से निरक्षता को भगाना होगा।


शैक्षिक इतिहास
भारत का शैक्षिक इतिहास अत्यधिक समृद्ध है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों द्वारा शिक्षा मौखिक रूप में दी जाती थी। शिक्षा का प्रसार वर्णमाला के विकास के पश्चात भोज पत्र और पेड़ों की छालों पर लिखित रूप में होने लगा। इस कारण भारत में लिखित साहित्य का विकास तथा प्रसार होने लगा। देश में शिक्षा जन साधारण को बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ-साथ उपलब्ध होने लगी। नालन्दा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसी विश्व प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानों की स्थापना ने शिक्षा के प्रचार में अहम भूमिका निभाई। लोगों में व्यावसायिक कौशल विकसित करने के लिए साक्षरता एक बड़ी ज़रूरत है।


शिक्षा का प्रसार
भारत में अंग्रेज़ों के आगमन से यूरोपीय मिशनरियों ने अंग्रेज़ी शिक्षा का प्रचार किया। इसके बाद से भारत में पश्चिमी पद्धति का निरन्तर प्रसार हुआ है। वर्तमान समय में भारत में सभी विषयों के शिक्षण हेतु अनेक विश्वविद्यालय और उनसे जुड़े़ हजा़रों महाविद्यालय हैं। भारत ने उच्च कोटि की उच्चतर शिक्षा प्रदान करने वाले विश्व के अग्रणी देशों में अपना स्थान बना लिया है।


शुल्क में वृद्धि
शिक्षा के शुल्क में अनेक कारणों से (विशेष रूप से व्यावसायिक शिक्षा) निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस कारण ग़रीब परिवार के बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होने लगी है।


साक्षर भारत
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की सभी महिलाओं को अगले पाँच सालों में साक्षर बनाने के लक्ष्य के साथ अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के मौके पर महिलाओं के लिए विशेष तौर पर ‘साक्षर भारत’ मिशन का शुभारंभ किया था। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई थी कि ‘साक्षर भारत’ मिशन, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन से भी ज़्यादा सफल साबित होगा। उन्होंने कहा था कि- "देश की एक तिहाई आबादी निरक्षर है। देश की आधी महिलाएं अभी भी पढ़-लिख नहीं सकतीं। साक्षरता के मामले में हम विश्व में सबसे पिछड़े देशों में शुमार हैं।"

प्रधानमंत्री ने कहा कि- "अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित व पिछड़े वर्गो की महिलाओं का साक्षर न होना हमारे लिए बहुत बड़ी चुनौती है और हमें इस चुनौती से पार पाना होगा। यदि हमें सभी नागरिकों को सशक्त करना है और तेज़ी से विकास करना है तो देश को पूरी तरह से साक्षर करना होगा। जिस ‘साक्षर भारत’ मिशन की आज हम शुरुआत कर रहे हैं वह साक्षरता के प्रति हमारी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को ज़ाहिर करता है। यह मिशन ख़ासकर महिलाओं में साक्षरता की दर बढ़ाने की हमारी कोशिश में मददगार साबित होगा।"

उन्होंने कहा कि- "साक्षरता के मामले में आज़ादी के बाद से हमने लगातार वृद्धि की है। वर्ष 1950 में साक्षरता की दर 18 फ़ीसदी थी, जो वर्ष 1991 में 52 फ़ीसदी और वर्ष 2001 में 65 फ़ीसदी पहुँच गयी।"
साक्षरता अभियानभारत भी बन सकता है, शत प्रतिशत साक्षर

साक्षरता दिवस का दिन हमें सोचने को मजबूर करता है, कि हम क्यो 100% साक्षर नहीं हैं। यदि केरल को छोड़ दिया जाए तो बाकि राज्यों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। सरकार द्वारा साक्षरता को बढ़ने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, मिड दे मील योजना, प्रौढ़ शिक्षा योजना, राजीव गाँधी साक्षरता मिशन आदि न जाने कितने अभियान चलाये गये, मगर सफलता आशा के अनुरूप नहीं मिली। मिड दे मील में जहाँ बच्चो को आकर्षित करने के लिए स्कूलों में भोजन की व्यवस्था की गयी, इससे बच्चे स्कूल तो आते हैं, मगर पढ़ने नहीं खाना खाने आते हैं। शिक्षक लोग पढ़ाई की जगह खाना बनवाने की फिकर में लगे रहते हैं। हमारे देश में सरकारी तौर पर जो व्यक्ति अपना नाम लिखना जानता है, वह साक्षर है। आंकड़े जुटाने के समय जो घोटाला होता है, वो किसी से छुपा नहीं है। अगर सही तरीक़े से साक्षरता के आंकडे जुटाए जाए तो देश में 64.9% लोग शायद साक्षर न हो। सरकारी आंकडो पर विश्वास कर भी लिया जाए तो भारत में 75.3% पुरुष और 53.7% महिलायें ही साक्षर हैं।
साक्षर कैसे बने

भारत 100% साक्षर कैसे बने। भारत में सबसे ज़्यादा विश्वविद्यालय है। हमारे देश में हर साल लगभग 33 लाख विद्यार्थी स्नातक होते हैं। उसके बाद बेरोज़गारों की भीड़ में खो जाते हैं। हम हर साल स्नातक होने वाले विद्यार्थियो का सही उपयोग साक्षरता को बढ़ाने में कर सकते हैं। स्नातक के पाठ्यक्रम में एक अतिरिक्त विषय जोड़ा जाए, जो सभी के लिए अनिवार्य हो। इस विषय में सभी छात्रों को एक व्यक्ति को साक्षर बनाने की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। शिक्षकों के द्वारा इसका मूल्यांकन किया जाएगा। अन्तिम वर्ष में मूल्यांकन के आधार पर अंकसूची में इसके अंक भी जोड़े जाए। इससे हर साल लगभग 33 लाख लोग साक्षर होंगे। वो भी किसी सरकारी खर्च के बिना।

भारतकोश से संकलित 

Thursday, 3 August 2017

रसखान के दोहे

खेलत फाग सुहाग भरी, अनुरागहिं लालन को धरि कै ।
भारत कुंकुम, केसर की पिचकारिन में रंग को भरि कै ॥


गेरत लाल गुलाल लली, मनमोहन मौज मिटा करि कै ।
जात चली रसखान अली, मदमस्त मनी मन कों हरि कै ॥


संकर से सुर जाहिं जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं।
नेक हिये में जो आवत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावै।।


जा पर देव अदेव भुअंगन वारत प्रानन प्रानन पावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।


मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढ़ि पितम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी।।


भावतो मोहि मेरो रसखान, सो तेरे कहे सब स्वाँग भरौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।


आवत है वन ते मनमोहन, गाइन संग लसै ब्रज-ग्वाला ।
बेनु बजावत गावत गीत, अभीत इतै करिगौ कछु रत्याना ।


हेरत हेरित चकै चहुँ ओर ते झाँकी झरोखन तै ब्रजबाला ।
देखि सुआनन को रसखनि तज्यौ सब द्योस को ताप कसाला ।


जा दिनतें निरख्यौ नँद-नंदन, कानि तजी घर बन्धन छूट्यो।
चारु बिलोकनिकी निसि मार, सँभार गयी मन मारने लूट्यो॥


सागरकौं सरिता जिमि धावति रोकि रहे कुलकौ पुल टूट्यो।
मत्त भयो मन संग फिरै, रसखानि सुरूप सुधा-रस घूट्यो॥


कान्ह भये बस बाँसुरी के, अब कौन सखी हमको चहिहै।
निसि द्यौस रहे यह आस लगी, यह सौतिन सांसत को सहिहै।


जिन मोहि लियो मनमोहन को, 'रसखानि' सु क्यों न हमैं दहिहै।
मिलि आवो सबै कहुं भाग चलैं, अब तो ब्रज में बाँसुरी रहिहै।


सोहत है चँदवा सिर मोर को, तैसिय सुन्दर पाग कसी है।
तैसिय गोरज भाल विराजत, तैसी हिये बनमाल लसी है।


'रसखानि' बिलोकत बौरी भई, दृग, मूंदि कै ग्वालि पुकार हँसी है।
खोलि री घूंघट, खौलौं कहा, वह मूरति नैनन मांझ बसी है।

Saturday, 29 July 2017

शुभ समाचार


दैनिक ऐक्य 
तिथि २९ जुलाई २०१७ 
पन्ना क्रमांक २ 

Wednesday, 19 July 2017

ज्ञानपीठ पुरस्कार

वर्ष – ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार
1965 (प्रथम)– जी शंकर कुरुप (मलयालम)
1966 (द्वितीय)– ताराशंकर बंधोपाध्याय (बांग्ला)
1967 (तृतीय)– (1) के.वी. पुत्तपा (कन्नड़) एवं (2) उमाशंकर जोशी (गुजराती)
1968 (चतु​र्थ)– सुमित्रानंदन पंत (हिन्दी)  चिदंबरा
1969 (5वाँ)– फ़िराक गोरखपुरी (उर्दू)
1970 (6वाँ)– विश्वनाथ सत्यनारायण (तेलुगु)
1971 (7वाँ)– विष्णु डे (बांग्ला)
1972 (8वाँ)– रामधारी सिंह दिनकर (हिन्दी)  उर्वशी
1973 (9वाँ)– (1) दत्तात्रेय रामचंद्र बेन्द्रे (कन्नड़) एवं (2) गोपीनाथ महान्ती (ओड़िया)
1974 (10वाँ)– विष्णु सखा खांडेकर (मराठी)
1975 (11वाँ)– पी.वी. अकिलानंदम (तमिल)
1976 (12वाँ)– आशापूर्णा देवी (बांग्ला)
1977 (13वाँ)– के. शिवराम कारंत (कन्नड़)
1978 (14वाँ)– एच. एस. अज्ञेय (हिन्दी) कितनी नावों में कितनी बार
1979 (15वाँ)– बिरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य (असमिया)
1980 (16वाँ)– एस.के. पोट्टेकट  (मलयालम)
1981 (17वाँ)– अमृता प्रीतम (पंजाबी)
1982 (18वाँ)– महादेवी वर्मा (हिन्दी)  यामा
1983 (19वाँ)– मस्ती वेंकटेश अयंगर (कन्नड़)
1984 (20वाँ)– तक्षी शिवशंकरा पिल्लई (मलयालम)
1985 (21वाँ)– पन्नालाल पटेल (गुजराती)
1986 (22वाँ)– सच्चिदानंद राउतराय (ओड़िया)
1987 (23वाँ)– विष्णु वामन शिरवाडकर कुसुमाग्रज (मराठी)
1988 (24वाँ)– डॉ. सी नारायण रेड्डी (तेलुगु)
1989 (25वाँ)– कुर्तुल एन. हैदर (उर्दू)
1990 (26वाँ)– वी.के.गोकक (कन्नड़)
1991 (27वाँ)– सुभाष मुखोपाध्याय (बांग्ला)
1992 (28वाँ)– नरेश मेहता (हिन्दी) 
1993 (29वाँ)– सीताकांत महापात्र (ओड़िया)
1994 (30वाँ)– यू.आर. अनंतमूर्ति (कन्नड़)
1995 (31वाँ)– एम.टी. वासुदेव नायर (मलयालम)
1996 (32वाँ)– महाश्वेता देवी (बांग्ला)
1997 (33वाँ)– अली सरदार जाफरी (उर्दू)
1998 (34वाँ)– गिरीश कर्नाड (कन्नड़)
1999 (35वाँ)– (1) निर्मल वर्मा (हिन्दी) एवं (2) गुरदयाल सिंह (पंजाबी)
2000 (36वाँ)– इंदिरा गोस्वामी (असमिया)
2001 (37वाँ)– राजेन्द्र केशवलाल शाह (गुजराती)
2002 (38वाँ)– दण्डपाणी जयकान्तन (तमिल)
2003 (39वाँ)– विंदा करंदीकर (मराठी)
2004 (40वाँ)– रहमान राही (कश्मीरी)
2005 (41वाँ)– कुँवर नारायण (हिन्दी)
2006 (42वाँ)– (1) रवीन्द्र केलकर (कोंकणी) एवं (2) सत्यव्रत शास्त्री (संस्कृत)
2007 (43वाँ)– ओ.एन.वी. कुरुप (मलयालम)
2008 (44वाँ)– अखलाक मुहम्मद खान शहरयार (उर्दू)
2009 (45वाँ)– अमरकान्त व श्रीलाल शुक्ल (हिन्दी)
2010 (46वाँ)– चन्द्रशेखर कम्बार (कन्नड)
2011 (47वाँ)– प्रतिभा राय (ओड़िया)
2012 (48वाँ)– रावुरी भारद्वाज (तेलुगू)
2013 (49वाँ)– केदारनाथ सिंह (दोनों हिन्दी)
2014 (50वाँ)– भालचन्द्र नेमाड़े (मराठी)
2014 (51वाँ)– रघुवीर चौधरी (गुजराती)